रामवृक्ष बेनीपुरी
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जन्म 23 दिसंबर, 1900 ईस्वी
बेनीपुर ग्राम, मुजफ्फरपुर जिला, बिहार, भारत
मृत्यु १९६८ (आयु ६८-६९)
व्यवसाय लेखक, नाटककार, निबंधकार, उपन्यासकार
राष्ट्रीयता भारतीय
उल्लेखनीय कार्य अंबपाली, पतितों के देश में, शकुन्तला

रामवृक्ष बेनीपुरी (२३ दिसंबर, 1900 - ९ सितंबर, १९६८) भारत के एक महान विचारक, चिन्तक, मनन करने वाले क्रान्तिकारी साहित्यकार, पत्रकार, संपादक थे।वे हिन्दी साहित्य के शुक्लोत्तर युग के प्रसिद्ध साहित्यकार थे।

परिचय

इनका जन्म २३ दिसंबर, 1900 को उनके पैतृक गांव मुजफफरपुर जिले (बिहार) के बेनीपुर गांव के एक भूमिहर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसी के आधार पर उन्होंने अपना उपनाम 'बेनीपुरी' रखा था। उनकी प्राथमिक शिक्षा ननिहाल में हुई थी। मैट्रिक पास करने के बाद वे असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये। उनकी भाषा-वाणी प्रभावशाली थी। उनका व्यक्तित्त्व आकर्षक एवं शौर्य की आभा से दीप्त था। वे एक सफल संपादक के रूप में भी याद किये जाते हैं।[1] वे राजनीतिक पुरूष न थे, पक्के देशभक्त थे। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आठ वर्ष जेल में बिताये थे।[2][3] ये हिन्दी साहित्य के पत्रकार भी रहे और इन्होंने कई समाचारपत्रों जैसे युवक (१९२९) भी निकाले। इसके अलावा कई राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता संग्राम संबंधी कार्यों में संलग्न रहे।[4] ९ सितंबर, १९६८ को वे इस संसार से विदा हो गये।

रचनाएँ

रामवृक्ष बेनीपुरी की आत्मा में राष्ट्रीय भावना लहू के संग लहू के रूप में बहती थी जिसके कारण आजीवन वह चैन की सांस न ले सके। उनके फुटकर लेखों से और उनके साथियों के संस्मरणों से ज्ञात होता है कि जीवन के प्रारंभ काल से ही क्रान्तिकारी रचनाओं के कारण बार-बार उन्हें कारावास भोगना पड़ता। सन् १९४२ में अगस्त क्रांति आंदोलन के कारण उन्हें हजारीबाग जेल में रहना पड़ा। जेलवास में भी वह शान्त नहीं बैठे सकते थे। वे वहां जेल में भी आग भड़काने वाली रचनायें लिखते। जब भी वे जेल से बाहर आते उनके हाथ में दो-चार ग्रन्थों की पाण्डुलिपियां अवश्य होतीं, जो आज साहित्य की अमूल्य निधि बन गईं। उनकी अधिकतर रचनाएं जेलवास की कृतियां हैं।

सन् १९३० के कारावास काल के अनुभव के आधार पर पतितों के देश में उपन्यास का सृजन हुआ। इसी प्रकार सन् १९४६ में अंग्रेज भारत छोड़ने पर विवश हुए तो सभी राजनैतिक एवं देशभक्त नेताओं को रिहा कर दिया गया। उनमें रामवृक्ष बेनीपुरी जी भी थे। कारागार से मुक्ति की पावन पवन के साथ साहित्य की उत्कृट रचना माटी की मूरतें कहानी संग्रह और आम्रपाली उपन्यास की पाण्डुलिपियां उनके उत्कृष्ट विचारों को अपने अन्दर समा चुकी थीं। उनकी अनेक रचनायें जो यश कलगी के समान हैं उनमें जय प्रकाश, नेत्रदान, सीता की मां, 'विजेता', 'मील के पत्थर', 'गेहूं और गुलाब' शामिल है।'शेक्सपीयर के गांव में' और 'नींव की ईंट'। इन लेखों में भी रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने देश प्रेम, साहित्य प्रेम, त्याग की महत्ता, साहित्यकारों के प्रति सम्मान भाव दर्शाया है वह अविस्मरणीय है।[1]

उनकी रचनाओं का विस्तृत विवरण इस प्रकार है-

नाटक

  • अम्बपाली -1941-46
  • सीता की माँ -1948-50
  • संघमित्रा -1948-50
  • अमर ज्योति -1951
  • तथागत
  • सिंहल विजय
  • शकुन्तला
  • रामराज्य
  • नेत्रदान -1948-50
  • गाँव के देवता
  • नया समाज
  • विजेता -1953.
  • बैजू मामा, नेशनल बुक ट्र्स्ट, 1994
  • शमशान में अकेली अन्धी लड़की के हाथ में अगरबत्ती - 2012

सम्पादन एवं आलोचन

  • विद्यापति की पदावली
  • बिहारी सतसई की सुबोध टीका

जीवनी