कछवाहा
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कछवाहा राजपूतों का ध्वज
नाराजय भवानी
प्रोफ़ाइल
राष्ट्रभारत
क्षेत्रउत्तर भारत, (आर्यावर्त)
वंशसूर्यवंशी
जातिराजपूत
कछवाहा का कोई अध्यक्ष नहीं है।

कछवाहा(कुशवाहा) वंश सूर्यवंशी राजपूतों की एक शाखा है। कुल मिलाकर बासठ वंशों के प्रमाण ग्रन्थों में मिलते हैं। ग्रन्थों के अनुसार[1]:

चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण

भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण

अर्थात दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का प्रमाण मिलता है।[1] इन्हीं में से एक क्षत्रिय शाखा कछवाहा (कुशवाहा) निकली। यह उत्तर भारत के बहुत से क्षेत्रों में फ़ैली।

अन्य राज्यों में

उत्तर प्रदेश

कछवाह (कुशवाहा) वंश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अयोध्या राज्य के सूर्यवंशी राजाओ की एक शाखा है। वहां के एक प्रतापी राजा रामचन्द्र के ज्येष्ठ पुत्र कुश की वंशावली से इस वंश का विस्तार हुआ है। अयोध्या राज्य के राजा भी कुशवाहा वंश के ही थे। इस वंश में इक्ष्वाकु, हरिशचन्द्र, सगर (जिनके नाम से सगर द्वीप है जहाँ गंगासागर संगम तीर्थ स्थल है), भगीरथ, दिलीप, रघु, दशरथ, रामचंद्र एवं उनके ज्येष्ठ पुत्र कुश हुए, जिनके नाम से उनके के वंशधर कुशवाहा कहलाये।[2]

उत्तर प्रदेश से उपजा कुश्वाह वंश उत्तर भारत के बहुत से राज्यों में विस्तृत रहा है।

बिहार

कुश के वंशजो की एक शाखा अयोध्या से चलकर साकेत (वर्तमान फ़ैजाबाद) आयी और साकेत से बिहार मे सोन नदी के किनारे रोहिताशगढ़ वर्तमान में (रोहतास) आयी और वहां रोहतास दुर्ग बसाया व शासन किया वर्तमान में इन्हें कुशवाहा के नाम से जाना जाता है।[2]

मध्यप्रदेश

कुश के वंशजो की एक शाखा बिहार के रोहताशगढ से चलकर पदमावती (वर्तमान ग्वालियर), मध्य प्रदेश पहुंचे। कछवाह(कुशवाहा) वंशज के एक राजकुमार तोरुमार नरवर (तोरनमार) पदमावती (ग्वालियर) मध्यप्रदेश मे आये। नरवर के पास का प्रदेश कच्छप प्रदेश कहलाता था। वहां कछवाह वंशज के एक राजकुमार तोरुमार ने एक नागवंशी राजा देवनाग को पराजित कर इस क्षेत्र को अपने अधिकार में किया। यहां पर कच्छप नामक नागवंशीय क्षत्रियो की शाखा का राज्य था।[3] नागो का राज्य ग्वालियर के आसपास था । इन नागो की राजधानी पद्मावती थी, पदमावती राज्य पर अपना अधिकार करके सिंहोनिया गाँव को अपनी सर्वप्रथम राजधानी बनाया जो वर्तमान में जिला मुरैना मे पड़ता है। कालान्तर में यह क्षेत्र राजा नल के कारण नरवर क्षेत्र कहलाया। कुशवाह राजाओं में राजा नल  सुविख्यात रहा है, जिसकी वीरगाथा ढोला गायन में सुनाई देती है। एक राजा नल-दमयंती का पुत्र ढोला जिसे इतिहास में साल्ह्कुमार के नाम से भी जाना जाता है का विवाह राजस्थान के जांगलू राज्य के पूंगल नामक ठिकाने की राजकुमारी मारवणी से हुआ था जो राजस्थान के साहित्य में ढोला-मारू के नाम से प्रख्यात प्रेमगाथाओं के नायक है।[2] इसी ढोला के पुत्र लक्ष्मण का पुत्र बज्रदामा बड़ा प्रतापी व वीर शासक हुआ जिसने ग्वालियर पर अधिकार कर एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। इसी क्षेत्र मे कछवाहो के वंशज महाराजा सूर्यसेन ने सन् ७५० ई० मे ग्वालियर का किला बनवाया था।

यहां आगे चलकर कछवाहो के पूर्वजो ने आकर कच्छपो से युद्द कर उन्हे हराया और इस क्षेत्र को अपने कब्जे में किया। इसी कारण ये कच्छप, कच्छपघात या कच्छपहा कहलाने लगे और यही शब्द बिगडकर आगे चलकर कछवाह(कुशवाहा) कहलाने लगा। यहां वर्षो तक कुशवाहा का शासन रहा। नरवर राज्य के राजा ईशदेव थे और राजा ईशदेव के पुत्र सोढदेव के पुत्र, दुल्हराय नरवर राज्य के अंतिम राजा थे।

राजस्थान

यह वंश राजस्थान के इतिहास में बारहवीं शताब्दी से प्रकट हुआ था।[4] सोढदेव का बेटा दुल्हराय का विवाह राजस्थान में मोरागढ़ के शासक रालण सिंह चौहान की पुत्री से हुआ था। रालण सिंह चौहान के राज्य के पड़ौसी दौसा के बड़गुजर राजपूतों ने मोरागढ़ राज्य के पचास गांव अपने अधिकार में कर लिए थे। अत: उन्हें मुक्त कराने के लिए रालण सिंह चौहान ने दुल्हेराय को सहायता हेतु बुलाया और दोनों की संयुक्त सेना ने दौसा पर आक्रमण कर बड़गुजर शासकों को मार भगाया। दौसा विजय के बाद दौसा का राज्य दुल्हेराय के पास रहा।

दौसा का राज्य मिलने के बाद दुल्हेराय ने अपने पिता सोढदेव को नरवर से दौसा बुलालिया और अपने पिता सोढदेव जी को विधिवत दौसा का राज्याभिषेक कर दिया गया। इस प्रकार राजस्थान में दुल्हेराय जी ने सर्वप्रथम दौसा में कछवाह राज्य स्थापित कर अपनी राजधानी सर्वप्रथम दौसा स्थापित की। राजस्थान में कछवाह साम्राज्य की नींव डालने के बाद दुल्हेराय जी ने भांडारेज, मांच, गेटोर, झोटवाड़ा आदि स्थान जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया।

दौसा से इन्होने ढूंढाड क्षेत्र में मॉच गॉव पर अपना अधिकार किया जहॉ पर मीणा जाति का कब्जा था, मॉच (या मॉची) गॉव के पास ही कछवाह राजवंश के राजा दुलहरायजी ने अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बनबाया । कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपने ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी तथा अपनी कुलदेवीश्री जमवाय माता जी के नाम पर उस मॉच (मॉची) गॉव का नाम बदल कर जमवारामगढ रखा।  इस वंश के प्रारम्भिक शासकों में दुल्हराय बडे़ प्रभावशाली थे, जिन्होंने दौसा, रामगढ़, खोह, झोटवाड़ा, गेटोर तथा आमेर को अपने राज्य में सम्मिलित किया था। सोढदेवकी मृत्यु व दुल्हेराय के गद्दी पर बैठने की तिथि माघ शुक्ला सप्तमी (वि.संवत ११५४) है I अधिकतर इतिहासकार दुल्हेराय जी का राजस्थान में शासन काल ११५४ से ११८४ वि०सं० के मध्य मानते है I

क्षत्रियों के प्रसिद्ध ३६ राजवंशों में कछवाहा(कुशवाहा) वंश के कश्मीर, राजपुताने (राजस्थान) में अलवर, जयपुर, मध्यप्रदेश में ग्वालियर, राज्य थे। मईहर, अमेठी, दार्कोटी आदि इनके अलावा राज्य, उडीसा मे मोरमंज, ढेकनाल, नीलगिरी, बऊद और महिया राज्य कछवाहो के थे। कई राज्य और एक गांव से लेकर पाँच-पाँच सौ ग्राम समुह तक के ठिकानें , जागीरे और जमींदारीयां थी राजपूताने में कछवाहो की१२ कोटडीया और५३ तडे प्रसिद्ध थीं।[2]

आमेर के बाद कछवाहो ने जयपुर शहर बसाया, जयपुर शहर से ७ किमी की दूरी पर कछवाहो का किला आमेर बना है और जयपुर शहर से ३२ कि.मी. की दूरी पर ऑधी जाने वाली रोड पर जमवारामगढ है। जमवारामगढ से 5 किमी की दूरी पर कछवाहो की कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बना है । इस मंदिर के अंदर तीनमू र्तियॉ विराजमान है, पहली मूर्ति गाय के बछडे के रूप में विराजमान है, दूसरी मूर्ति श्री जमवाय माता जी की है, और तीसरी मूर्ति बुडवाय माता जी की है।

श्री जमवाय माता जी के बारे में कहा गया है, कि ये सतयुग में मंगलाय, त्रेता में हडवाय, द्वापर में बुडवाय तथा कलियुग में जमवाय माता जी के नाम से देवी की पूजा - अर्चना होती आ रही है।

कछवाहों की खापें

कछवाहा राजपूतों में लगभग ६५ खापें होती हैं। ये इस प्रकार से हैं:[2]

देलणोत ,झामावत ,घेलणोत , राल्णोत ,जीवलपोता ,आलणोत (जोगी कछवाहा) , प्रधान कछवाहा , सावंतपोता, खीवाँवात , बिकसीपोता,पीलावत ,भोजराजपोता (राधरका,बीकापोता ,गढ़ के कछवाहा,सावतसीपोता) ,सोमेश्वरपोता,खींवराज पोता, दशरथपोता,बधवाड़ा,जसरापोता, हम्मीरदे का , भाखरोत, सरवनपोता,नपावत,तुग्या कछवाहा, सुजावत कछवाहा, मेहपाणी , उग्रावत , सीधादे कछवाहा, कुंभाणी , बनवीरपोता,हरजी का कछवाहा,वीरमपोता, मेंगलपोता, कुंभावत, भीमपोता या नरवर के कछवाहा, पिचयानोत , खंगारोत,सुल्तानोत, चतुर्भुज, बलभद्रपोत, प्रताप पोता, नाथावत, बाघावत, देवकरणोत , कल्याणोत, रामसिंहहोत, साईंदासोत, रूप सिंहसोत, पूर्णमलोत , बाकावत , राजावत, जगन्नाथोत, सल्देहीपोता, सादुलपोता, सुंदरदासोत , नरुका, मेलका,लाडखानी शेखावत, करणावत , मोकावत , भिलावत, जितावत, बिझाणी, सांगणी, शिवब्रह्मपोता , पीथलपोता, पातलपोता।

सन्दर्भ

  1. रामेन्द्र सिंह भदौरिया. "राजपूतों की वंशावली". कालगति, विकिडाट.
  2. "राजस्थान में कछवाहा वंश का इतिहास". गूगल साइट्स.
  3. महाभारत आदि पर्व श्लोक ७१
  4. प्रकाश जोशी (08-12-2013)। आमेर का कछवाहा वंश

इन्हें भी देखें

बाहरी कडियां

Original: Original:

https://hi.wikipedia.org/wiki/कछवाहा